छत्तीसगढ़

कल 26 मई को काला दिवस : किसान संगठन घेरेंगे भूपेश सरकार को भी

550 संगठनों से बने संयुक्त किसान मोर्चा और अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के देशव्यापी आह्वान पर कल 26 मई को छत्तीसगढ़ किसान आंदोलन से जुड़े 25 से ज्यादा संगठन कल 26 मई को पूरे प्रदेश में काला दिवस मनाएंगे तथा गांव-गांव, घर-घर में काले झंडे लगाएंगे और मोदी सरकार का पुतला जलाकर किसान विरोधी काले कानूनों को वापस लेने और सी-2 लागत मूल्य का डेढ़ गुना न्यूनतम समर्थन मूल्य देने का कानून बनाने की मांग करेंगे। किसानों के इस आंदोलन को सीटू, इंटक, एटक सहित सभी केंद्रीय ट्रेड यूनियनों ने और माकपा, भाकपा व कांग्रेस सहित देश की 12 विपक्षी पार्टियों ने अपना सक्रिय समर्थन देने की घोषणा की है।

उल्लेखनीय है कि कल 26 मई को उक्त मांगों पर दिल्ली की सभी सीमाओं पर जारी किसान धरनों के 6 माह पूरे होने जा रहे हैं, तो मोदी सरकार के भी केंद्र में सत्ता में आने के 7 साल पूरे होने जा रहे है। मोदी सरकार के इस कार्यकाल को ‘कुशासन’ करार देते हुए इन संगठनों ने कहा है कि भाजपा ने वादा तो किसानों की आय दुगुनी करने का किया था, लेकिन उसकी कॉर्पोरेटपरस्त नीतियों के कारण वास्तव में किसानों की आय घटकर आधी हो गई है, जमीन उनके हाथ से छीने जाने का खतरा पैदा हो गया है और वर्ष 2014 के मुकाबले किसानों की आत्महत्याएं बढ़कर दुगुनी हो गई है। अब संसद में तानाशाहीपूर्ण तरीके से पारित किए गए ये किसान विरोधी कानून उनके लिए मौत का परवाना है। इसलिए इन कानूनों की वापसी तक ये आंदोलन जारी रहेगा।

आज यहां जारी एक बयान में किसान आंदोलन से जुड़े नेताओ ने सुकमा के सिलगेर में आदिवासियों पर गोलियां चलाने और तीन आदिवासी किसानों की मौतों की निंदा करते हुए राजनैतिक दलों और सामाजिक संगठनों के कार्यकर्ताओं को घटना स्थल तक न जाने देने के लिए भूपेश सरकार को भी घेरा है और इस गोलीकांड की हाई कोर्ट के किसी रिटायर्ड जज से उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। किसान नेताओं ने पूछा है कि इस सरकार में इतनी डर और बेचैनी क्यों है और वास्तव में वह आम जनता से क्या छुपाना चाहती है? गोलीकांड की दंडाधिकारी जांच के आदेश को खारिज करते हुए किसान आंदोलन के नेताओं ने इसे लीपापोती करार दिया है और इस गोलीकांड के लिए प्रथम दृष्टया जिम्मेदार अधिकारियों पर तुरंत कार्यवाही की मांग की है। वनोपजों की खरीदी पुनः शुरू करने की मांग भी किसान आंदोलन के नेताओं ने की है।

उन्होंने कहा कि कोरोना काल में जितने लोगों की मौत हुई है, वे महामारी से कम, निजीकरण के कारण इस सरकार की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था से ज्यादा मरें हैं। इन मौतों ने सरकार के चेहरे को बेनकाब और राजा को नंगा कर दिया है। कोरोना से बचाव के लिए संसद द्वारा आबंटित फंड का इस्तेमाल सार्वभौमिक टीकाकरण के लिए करने तथा गांव स्तर पर बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने की मांग भी किसान नेताओं ने की है। किसान नेताओं ने सभी गरीब परिवारों को 7500 रुपये प्रतिमाह आर्थिक मदद देने की मांग भी मोदी सरकार से की है।

(छत्तीसगढ़ किसान आन्दोलन की ओर से सुदेश टीकम, संजय पराते (मो : 094242-31650), आलोक शुक्ला, विजय भाई, रमाकांत बंजारे, नंदकुमार कश्यप, आनंद मिश्रा, दीपक साहू, जिला किसान संघ (राजनांदगांव), छत्तीसगढ़ किसान सभा, हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति (कोरबा, सरगुजा), किसान संघर्ष समिति (कुरूद), आदिवासी महासभा (बस्तर), दलित-आदिवासी मजदूर संगठन (रायगढ़), दलित-आदिवासी मंच (सोनाखान), भारत जन आन्दोलन, गाँव गणराज्य अभियान (सरगुजा), आदिवासी जन वन अधिकार मंच (कांकेर), पेंड्रावन जलाशय बचाओ किसान संघर्ष समिति (बंगोली, रायपुर), उद्योग प्रभावित किसान संघ (बलौदाबाजार), रिछारिया केम्पेन, आदिवासी एकता महासभा (आदिवासी अधिकार राष्ट्रीय मंच), छत्तीसगढ़ प्रदेश किसान सभा, छत्तीसगढ़ किसान महासभा, परलकोट किसान कल्याण संघ, वनाधिकार संघर्ष समिति (धमतरी), आंचलिक किसान संघ (सरिया) आदि संगठनों की ओर से जारी संयुक्त विज्ञप्ति)

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